Skip to main content

International Hindi Association

संवाद - October 2021

संवाद - October 2021

October 30, 2021 Samwad
 
 
 
 
 
INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER
अक्टूबर  2021, अंक ५  | प्रबंध सम्पादक: सुशीला मोहनका
 
 
Human Excellence Depends on Culture. The Soul of Culture is Language
भाषा द्वारा संस्कृति का प्रतिपादन
 
 
 
 
अध्यक्षीय संदेश
 
- अजय चड्ढा
 
मुझे उम्मीद है कि आप सभी स्वस्थ होंगे और अब सभी अपनी सामान्य दिनचर्या में वापस आ गये होंगे। अक्टूबर 9 एवं 10 को द्विवार्षिक 20वां अंतर्राष्ट्रीय हिंदी अधिवेशन (आभासी) आयोजित किया गया था, जो कि बहुत ही सफलता के साथ सम्पूर्ण हुआ। "दूसरी भाषा के रूप में हिंदी के लिए शिक्षण और सीखने की तकनीक" विषय पर विशेष रूप से केंद्रित 9 कार्यशालायें अधिवेशन का मुख्य आकर्षण रहे। 4 स्थानीय शहरों Medina, Solon, Broadview Heights और Independence ओहायो के महापौरों से भारी समर्थन मिला। Medina ओहायो, Mayor ओहायो द्वारा 4 अक्टूबर से 10 अक्टूबर, 2021 तक को ‘अंतरराष्ट्रीय हिंदी जागरूकता सप्ताह’ के रूप में घोषित किया गया। Solon ओहायो, महापौर ने अक्टूबर माह को अंतर्राष्ट्रीय हिंदी जागरूकता माह के रूप में घोषित किया। यह बहुत ही गर्व की बात है। अधिवेशन के अन्य मुख्य कार्यक्रम में विशाल कवि सम्मेलन और दुनिया भर के विभिन्न देशों में भागीदारी थी। इसके अलावा सांस्कृतिक कार्यक्रम में भी कई देशों की भागीदारी थी। अधिवेशन के अवसर पर एक सुन्दर, रंगीन, "स्मारिका" का प्रकाशन एवं लोकार्पण भी किया गया। मैं पूर्वोत्तर ओहायो शाखा के संयोजकों को अधिवेशन के सफलतापूर्वक सम्पन्न होने की हार्दिक बधाई प्रेषित करता हूँ।
 
 
 अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति का  २० वां द्विवार्षिक अधिवेशन, २०२१ 
 
 
 
 दीप प्रज्ज्वलन: बायें से दांये -- डॉ राजीव रंजन, डॉ शोभा खंडेलवाल, श्रीमती सुशीला मोहनका, श्रीमती किरण खेतान, श्रीअजय चड्डा एवं सूत्रधार श्री तेज पारीख  
 
 
 
 
 
 
हिंदी भाषा के सम्मान और स्वाभिमान की वैश्विक स्थापना के संकल्प के साथ सम्पन्न हुआ
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के २० वें द्विवार्षिक अधिवेशन का उदघाटन
 
 मेडाइना, ओहायो अक्टूबर ९, २०२१-
हिंदी भाषा के सरंक्षण और संवर्धन के लिये प्रतिबद्ध और इसके माध्यम से भारतीय संस्कृति के वैश्विक प्रसार में जुडी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति का २० वाँ द्विवार्षिक अधिवेशन उत्तरी अमेरिका के ओहायो राज्य के मेडाइना शहर में संपन्न हुआ। ९ अक्टूबर सुबह दस बजे से लेकर १० अक्टूबर शाम ७ बजे तक चला यह द्विवार्षिक अधिवेशन भारत के अलावा अन्य देशों में हिंदी को द्वितीय भाषा के रूप में मान्यता दिलवाने और इसके लिए भाषा को सीखने और सिखाने की नयी तकनीकों को विकसित करने हेतु समर्पित रहा।
कोरोना की वैश्विक़ महामारी के कारण इस बार का अधिवेशन आभासिय और व्यक्तिगत दोनों रूपों में मिश्रित रूप से आयोजित किया गया जिसे विश्व के पाँच महाद्वीपों के विभिन्न देशों से हज़ारों हिंदी प्रेमियों ने परोक्ष और अपरोक्ष रूप से ज़ूम, यूट्यूब, फेसबुक पर हुए सीधे प्रसारण अथवा प्रत्यक्ष रूप से अधिवेशन स्थल पर जुड़कर सफल बनाया। अधिवेशन की विशेष सफलता का अन्दाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस बार ओहायो राज्य के चार बड़े शहरों के महापौरों ने अधिवेशन के समर्थन में हिंदी भाषा के प्रचार और प्रसार हेतु अपने शहरों में राजकीय उद्घोषणा की। कोरोना काल की विषमतम परिस्थितयों में आयोजित यह अधिवेशन कई अर्थों में अभूतपूर्व था जो निश्चित रूप से हिंदी समिति के संगठन की विकास यात्रा के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होगा।
अधिवेशन का विधिवत उद्घाटन स्वर्गीय गुलाब खण्डेलवाल जी के निवास स्थान पर श्रीमती सुशीला मोहनका (न्यासी समिति अध्यक्ष और विश्वा की प्रबंध संपादक), श्रीमान अजय चड्डा (समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष) श्रीमती किरण खेतान (अधिवेशन की संयोजिका), डॉ. शोभा खंडेलवाल (अधिवेशन की सहसंयोजिका और उत्तरपूर्व ओहायो शाखा की अध्यक्षा) और डॉ. राकेश रंजन (हिंदी समिति के सहयोगी और शुभचिंतक) ने दीप प्रज्ज्वलन किया। हिंदी समिति द्वारा विगत चालीस वर्षों से ओहायो राज्य में चलाये जा रहे हिंदी प्रशिक्षण विद्यालय के विद्यार्थी कुमार कृष पारीख ने अपने मधुर स्वरों में सरस्वती वंदना का गायन कर सभी का मन मोह लिया।
कार्यक्रम की अगली कड़ी में मैडाइना शहर के महापौर डैनिस हैनवेल ने व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर हिंदी भाषा के विकास, प्रचार और प्रसार में जुटे अधिवेशन के आयोजकों को बधाई और शुभकानाएं दी तथा साथ ही मैडाइना शहर में हिंदी भाषा की जागरूकता बढ़ाने हेतु अधिकारिक राजकीय उद्घोषणाओं का वाचन भी किया। ब्रॉडव्यू हाइट्स के महापौर सैम अलाइ, इंडिपेंडेंस शहर के महापौर ग्रेगरी कर्टज़ और सोलन शहर के महापौर एडवर्ड क्रॉस ने भी अपनी शुभ कामनाएं लिखित रूप में भेजी जो कि स्मारिका में प्रकाशित है। मैडाइना, ब्रॉडव्यू हाइट्स और इंडिपेंडेंस शहर में जहाँ अक्टूबर २०२१ के दूसरे सप्ताह को हिंदी सप्ताह के रूप में मनाने की घोषणा हुई वहीँ सोलन शहर ने सम्पूर्ण अक्टूबर हिंदी जागरूकता माह के रूप में मनाने का संकल्प लिया।
अधिवेशन के उद्घघाटन सत्र के प्र्रारम्भ में अधिवेशन संयोजिका श्रीमती किरण खेतान ने अधिवेशन में जुड़े सभी सदस्यों का स्वागत करते हुए अधिवेशन की रूपरेखा और भारत के अलावा अन्य देशों में हिंदी को द्वितीय भाषा के रूप में मान्यता दिलवाने के अधिवेशन के मूल उद्देश्य को विस्तार से समझाया। श्रीमती खेतान ने अधिवेशन में हिंदी भाषा को सीखने और सिखाने के लिए आयोजित नौ कार्यशालाओं, हिंदी भाषा की विकास यात्रा पर आयोजित नाटक, सांस्कृतिक कार्यक्रम और कवि-सम्मेलन के बारे में सभी सहभागियों को अवगत करवाया।
इसके बाद श्रीमती सुशीला मोहनका ने अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की १९८० के स्थापना काल से लेकर २०२१ तक की विकास यात्रा पर प्रकाश डाला और इस ऐतिहासिक यात्रा में समर्पित कार्यकर्ताओं और हिंदी प्रेमियों के योगदान को खट्टे-मीठे अनुभवों के साथ याद किया। श्रीमती मोहनका ने अधिवेशन के सभी सहभागियों से समिति की आजीवन सदस्यता को बढ़ाने की अपील करते हुए अमेरिका और अन्य देशों में समिति की नयी शाखाएं खोलने का आह्वान किया। श्रीमती मोहनका ने अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की पत्रिका "विश्वा" के संपादक और प्रकाशन मंडल की भूरी-भूरी प्रशंसा करते हुए हाल ही में प्रकाशित हुए पत्रिका के रंगीन संस्करणों पर अपनी प्रसन्नता व्यक्त की।
अध्यक्ष अजय चड्डा ने कार्यक्रम के अगले क्रम में अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की कार्यकारिणी समिति का परिचय और धन्यवाद ज्ञापित करते हुए अपने दो वर्षीय अध्यक्षीय काल में समिति द्वारा हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार, हिंदी साहित्य के विकास और संस्था के संगठनात्मक विस्तार को संकल्पित त्रिसूत्रीय कार्यों का विस्तृत ब्योरा दिया। अधिवेशन के सभी सहभागियों ने अजय चड्डा जी के कार्यकाल में उनके द्वारा प्रारम्भ किये नए प्रकल्पों और समिति के नियमित कार्यों में जोड़े नवीन तकनीकी आयामों की खुले मन से प्रशंसा की।
उद्घाटन सत्र का समारोह भाषण उत्तरपूर्व ओहायो शाखा की अध्यक्षा और अधिवेशन की सहसंयोजिका
डॉ. शोभा खंडेलवाल ने दिया। उन्होंने एक बार पुनः अधिवेशन के सहभागियों का स्वागत करते हुए अपने परिवार के समिति से लम्बे जुड़ाव के संस्मरणों को भी साझा किया और अधिवेशन को सफल बनाने में कई महीनों से जुटे उत्तरपूर्व ओहायो शाखा के कार्यकर्ताओं को धन्यवाद ज्ञापित किया।
मुख्य वक्ता Keynote Speaker – डॉ. गब्रिएल्ला Dr. Gabriella
विश्वा का लोकार्पण – श्रीमती सुशीला मोहनका, न्यासी अध्यक्ष के द्वारा किया गया । विश्वा की
विशेषतायें बताते हुए पहली प्रति राष्ट्रीय अध्यक्ष अजय चड्डा जी को दी।
स्मारिका का लोकार्पण – डॉ. पुरषोत्तम गुजराती, पूर्व अध्यक्ष, अ.हि.स. की उत्तर पूर्व ओहायो शाखा ने
स्मारिका का लोकार्पण किया और पहली प्रति डॉ. शैल जैन को दी।
 
 
 
सांस्कृतिक कार्यक्रम
1.सरस्वती वंदना
2.गणेश वंदना
3.अन्तर किड्स ग्रुप द्वारा डांस
4.स्वस्ति पाण्डेय, कैलिफ़ोर्निया
5.अधिवेशन के लिए विशेष कार्यक्रम का विडियो – द्वारा इंडिआनापोलिस चैप्टर
6.वैशाली
7.शिवानी मतान्हेलिया द्वारा गीत, उत्तर प्रदेश, भारत
8.नैशविल चैप्टर – अ. अधिवेशन के लिए विशेष कार्यक्रम का विडियो ब. पूजा श्रीवास्तव का कार्यक्रम
9.किड्स डांस
10.रिंकू – ग़ज़ल
11.अधिवेशन के लिए विशेष कार्यक्रम का विडियो – द्वारा ह्यूस्टन चैप्टर
12.स्वरांजलि
13.Kaleidoscope केलाइडोस्कोप dance
14.न्यू जर्सी चैप्टर – डॉ. बबिता श्रीवास्तव का कार्यक्रम
15.भाषा की यात्रा -
मेडाइना, अक्टूबर १०, २०२१-
सरस्वती वंदना – अर्चना पांडा, कैलिफ़ोर्निया
सोलन के महापौर श्री एडवर्ड एच. क्रॉस ने २०वे द्विवार्षिक अंतर्राष्ट्रीय हिंदी अधिवेशन २०२१ में भाग लेने वालों को संबोधित किया और अक्टूबर १०, २०२१ वाले माह को ‘हिन्दी जागरूकता माह’ घोषित किया।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के पूर्वोत्तर ओहायो शाखा द्वारा आयोजित, २०वें द्विवार्षिक अंतर्राष्ट्रीय हिंदी अधिवेशन की पूर्व संध्या पर, ९ और १० अक्टूबर २०१२ को, कई शहरों ने हिंदी भाषा की मान्यता की घोषणा की।
उत्तरपूर्वी ओहायो शाखा के भारतीय समुदाय को ब्रॉडव्यू हाइट्स शहर के महापौर सैमुअल जे अलाई ने 9 और 10 अक्टूबर, 2021 को हुए 20वें द्विवार्षिक अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी अधिवेशन में हुई सांस्कृतिक शाम की बधाई दी।
इंडिपेंडेंस शहर के महापौर ग्रेगरी पी. कर्ट्ज़ ने ४-१० अक्टूबर, २०२१ को अंतर्राष्ट्रीय ‘हिन्दी जागरूकता सप्ताह’ के रूप में घोषित किया। मेडाइना शहर के महापौर डेनिस हैनवेल ने भी ४-१० अक्टूबर, २०२१ को अंतर्राष्ट्रीय ‘हिन्दी जागरूकता सप्ताह’’ के रूप में घोषित किया। सोलन के महापौर एडवर्ड एच. क्रूसो ने अक्टूबर २०२१ महीने को अंतर्राष्ट्रीय ‘हिन्दी जागरूकता माह’ घोषित किया।
सम्मानित अतिथि, सोलन शहर के महापौर, श्री एडवर्ड एच. क्रॉस ने 20 मिनट के लिए आभासी दर्शकों को संबोधित किया। मेयर क्रॉस ने कहा कि अमेरिका बहुसांस्कृतिक, और बहुजातीय लोगों का देश है। यद्यपि हम अमेरिका को “melting into the pot" के बजाय " melting pot" कहते हैं, हम अपनी संस्कृतियों का जश्न मनाते हैं। जब हम अपनी अनूठी सांस्कृतिक विरासत का जश्न मनाते हैं और विभिन्न संस्कृतियों में इस तरह के आयोजनों को साझा करते हैं, तो अमेरिका और मजबूत और समृद्ध होता है। श्री महापौर ने आयोजकों को बधाई दी और अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति की उत्तरपूर्वी ओहायो शाखा को निमंत्रण दिए जाने के लिए धन्यवाद दिया।
२०वे अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी अधिवेशन के प्रायोजकों की ओर से सोलन शहर के मेयर, श्री एडवर्ड क्रॉस को धन्यवाद दिया।
कवि-सम्मेलन – प्रत्येक बार की तरह इस बार भी अधिवेशन में विराट कवि सम्मेलन बहुत ही अच्छी तरह सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम आभासी होने का एक विशेष लाभ अधिवेशन को मिला कि विभिन्न राष्ट्रों से कवि एवं श्रोता अत्यधिक संख्या में जुड़ सके । विश्वस्त सूत्र से मालूम हुआ कि पाँच महादेशों से हजारों से ऊपर की संख्या में जनता-जनार्दन का जुड़ाव हुआ ।
खुला अधिवेशन एवं सम्मान समारोह -
 
 
 
समापन समारोह – धन्यबाद ज्ञापन डॉ. शोभा खंडेलवाल ने दिया।
 संझिप्त  में सबों ने स्मारिका, पुरस्कार, सम्मान, स्मारिका और विस्वा अक्टूबर २०२१--विमोचन, कवि-सम्मेलन, कार्यशालाओं, प्रतियोगिताओं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, विभिन्न खेलों का आनंद लिया। सभी उम्र के लोगों के लिए आनन्द ही आनन्द रहा। बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए ।
आभासी अधिवेशन के विस्तृत समाचारों को जल्द ही अ.हि.स. की निम्नलिखित वेबसाइट पर देखा जा सकता है –
१. www.hindi.org
२. http://iha-neohio.com
३. Facebook - IHA Northeast Ohio Chapter
 
 
 अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति २०२२ - २०२३  के पदाधिकारी
 
 
 
शाखाओं के कार्यक्रम
 
 
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति - कोलोराडो शाखा की प्रथम वर्चुअल गोष्ठी सितम्बर २०२१
 
 
 
 
हिंदी के प्रचार व प्रसार हेतु उनके निजी अनुभव एवं विचार :
 
हमारे बचपन के समय में अक्सर हमारे विद्यालाय के अध्यापक हम लोगो को अंग्रेजी अच्छी करने के लिए यही परामर्श देते थे कि घर में हमेशा अंग्रेजी में ही बातें किया करो, इससे आप बहुत जल्दी अंगरेजी भाषा में प्रवीण हो जायेंगे। इसी विचार को आज मैं हिंदी के लिए रखना चाहूँगी। आज हमारी भाषा की पूर्णता, नैसर्गिकता और शुद्धता बहुत हद तक छिन्न-भिन्न हो चुकी है और अगर कोई इस बात से सहमत नहीं है तो मैं कहूँगी की आप किसी भ्रम मैं जी रहे हैं। खैर जैसा की मैंने कहा उपरोक्त विचारों को जो की अंगरेजी के लिए थे, मैं उन्हें हिंदी के लिए प्रयुक्त करना चाहूँगी और कहूँगी की बस अब से आप घर में, अपने परिजनों के साथ, अपने वृहद परिवार में तथा अपने मित्रों के बीच बिना किसी लज्जा के हिंदी में वार्ता करें, बातें करें। मैंने अपने बच्चों को मेरे साथ हिंदी की पुरानी फिल्में और हिंदी धारावाहिक देखने का चस्का लगा दिया और आज हम सब १९६०-से-२००० की देव आनंद, शम्मी कपूर, अमिताभ बच्चन, जीतेन्द्र, धर्मेंद्र की फ़िल्में देखते हैं। पुरानी हिंदी फिल्में, टीवी धारावाहिक जैसे चंद्र गुप्त, तेनाली रामा, हिंदी फ़िल्मी गाने आदि जो कि अपने समय में काफी प्रचलित रहे हैं, वह अपने परिवार के साथ विशेषत: बच्चो के साथ देखें व सुने। यह प्रयोग मैंने अपने बच्चों के साथ किया और मुझे अविश्वसनीय सफलता प्राप्त हुई। जिस तरह से हमारे माता-पिता व अध्यापक हमें अंग्रेजी बोलने के लिए प्रेरित करते थे, जिससे काफी हद तक हमारी अंग्रेजी अच्छी भी हुई थी, उसी तरह मैंने अपने बच्चों से हिंदी में बात की, चलचित्र देखे, प्रसिध्द धरावाहिक देखे। आज अक्सर मुझे अपने मित्रों ये बाते सुनाने को मिलती है कि "अरुणिमा, विश्वास ही नहीं होता है कि तुम्हारे बच्चों का शिक्षण अमेरिका में हुआ है, इनकी तो हिंदी बहुत अच्छी है। "
 
 
द्वारा - डॉ. अरुणिमा वैष्णव
 
डॉ. अरुणिमा वैष्णव, कोलोराडो से हैं| अपने पति और बच्चों के साथ लम्बें अरसे से अमेरिका में रह रही हैं। पर अपने घर के अन्दर हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृति को संभाल कर रखा है। अपने अनुभवों को बहुत ही अच्छी तरह से व्यक्त किया है। साथ ही समाज के अन्य बच्चों में हिंदी और भारतीय संस्कृति की जड़ें डालने का निश्चय ले चूकी है।
 
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
 यह एक सफल प्रयोग रहा और मुझे इस पर गर्व है। मुझे लगता है कि यदि आप अपने बच्चों से हिंदी प्रचार की शुरुआत करें तो हिंदी को अपनी पहचान खोनी ही न पड़ेगी और दिन प्रतिदिन वह विकसित होगी।
मेरा इस समिति से जुड़ना न सिर्फ मेरे लिए अपितु मेरे परिवार के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आज मुझे उन्हें किसी भी कविता या गजल के किसी कठिन शब्द को समझने के लिए अत्यधिक प्रयास नहीं करना पड़ता है और वे सभी कवि सम्मलेन, हिंदी गीतों की प्रस्तुति को बड़े ही आंनद के साथ सुनते हैं। इसी सोच को प्रसारित करने हेतु आज मुझे अंतर्राष्टीय हिंदी समिति का यह मंच एक उत्तम साधन प्रतीत होता है ।
 
 
 
 
सितम्बर २०२१ माह के आभाषी कार्यक्रम की एक झलक
 
 
 
 
दिनांक ०२ अक्टूबर २०२१ को चेरी क्रीक स्टेट पार्क में दाल-बाटी पिकनिक
 
दिनांक ०२ अक्टूबर २०२१ को चेरी क्रीक स्टेट पार्क में दाल-बाटी पिकनिक आयोजित की गयी। जिसमें काफी परिवार सम्मिलित हुए। कक्षा आठवीं में पढ़ने वाले अभी के मुख से कुछ हिंदी शब्द जैसे माध्यमिक, प्राथमिक, पाठशाला, विद्यालय सुनकर प्रसन्नता का अनुभव किया। मात- पिता पर गर्व भी क्यूंकि यह परिवार जुलाई २१ में ही सिंगापुर से कोलोराडो आया।
आगे भी जल्दी-जल्दी मिलन गोष्ठियाँ होंगी, कार्यक्रम होंगे, आजीवन सदस्य बढ़ेंगे यही मेरी हार्दिक अभिलाषा है और प्रयास भी रहेगा|
 
 
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति नॉर्थ कैरोलिना में भारत के ७५वें स्वतंत्रता दिवस- आभासी कवि सम्मेलन
 
 
 
 
 
 
भारत के ७५वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर समिति की अध्यक्षा प्रिया भारद्वाज जी द्वारा आभासी कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। भारतीय कहीं भी हों उनके हृदय से अपने देश के लिए प्रेम कभी कम नहीं होता। इसी भावना के चलते, संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के नॉर्थ कैरोलिना राज्य स्थित शार्लेट नगर की अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के तत्वावधान में भारत के ७५वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर समिति की अध्यक्षा प्रिया भारद्वाज जी द्वारा आभासी कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में बड़े सम्मान के साथ शहीदों को याद किया एवं देश भक्ति की रचनाओं का पाठ किया गया। कार्यक्रम में शार्लेट एवं लंदन, यूके के कवियों ने भाग लिया और देश भक्ति से प्रेरित अपनी कविताएँ प्रस्तुत की। कार्यक्रम के संयोजक थे श्री आशीष तिवारी एवं कार्यक्रम का संचालन श्रीमती तौषी चौरे द्वारा किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत वरिष्ठ सदस्य श्री बाल गुप्ता जी ने अपनी देश भक्ति की कविता सुनाकर की। जिसमें उन्होंने बड़े रोचक तरीक़े से नदी और देश का वर्णन किया।
 
 
द्वारा- प्रिया भारद्वाज
शार्लेट, नॉर्थ कैरोलिना 
 
 
 
 
 
इसके पश्चात अंजु अग्रवाल जी द्वारा ये पंक्तियाँ सुनाई गयी, जिससे देश की यादें जीवंत हो उठी:-
“विदेश में रहकर भारत माँ की, भारत परिवार की याद रह रह कर सताती है !!
बरसात में कच्ची मिट्टी की सोंधी सुगन्ध की महक भी याद आती है !!”
कार्यक्रम में पधारे अतिथि कवि श्री तारकेश्वर जी चौरे ने अपनी कविता गायन के साथ प्रस्तुत की, जिसमें तिरंगे की आन बान शान का संदेश कुछ इस प्रकार दिया गया :-
“झंडा तिरंगा लहरता है, अपनी पूरी शान से।
मिली आज़ादी हमें, वीरों के बलिदान से।“

अगले क्रम में आए कवि श्री आशीष तिवारी जी जिनकी कविताएँ अत्यंत प्रभावशाली रहती हैं। अपनी चिर-परिचित रोचक शैली में लयबद्धता के साथ उन्होंने भारत देश की महानता का वर्णन इस मुक्तक के साथ किया:- “बड़ा ही गर्व है जिसपर, वो मेरा देश भारत है,
जहाँ कण-कण में है ईश्वर, वो मेरा देश भारत है,
ये भूमि हो गयी पावन, महापुरुषों के चरणों से,
जहाँ है स्वर्ग धरती पर, वो मेरा देश भारत है।”
इसके अतिरिक्त उन्होंने भारतवर्ष के गौरवशाली इतिहास एवं प्रगतिशील वर्तमान का वर्णन अपनी कविता:- “तब मेरा भारत बनता है” के द्वारा किया।
तत्पश्चात्, गम्भीर कविताओं की विशेषज्ञ श्रीमती श्वेता गुप्ता जी ने अपनी कविता के माध्यम से देश के आदर्शों को और देशसेवा की भावना को पुनर्जीवित करने की प्रेरणा इन पक्तियों से दी:-
“कोई ले जाए इस युग को फिर गाँधी के पदचिन्हो पर,
न रह जाए लिखा हुआ सब इतिहास के पन्नो पर।

आज फिर वही जोश फिर वही शक्ति पैदा करनी है ,
हर पग पर, हर एक कदम भारत माँ की सेवा करनी है”
अगले क्रम में पधारे, श्री अवनीश अवस्थी जी द्वारा स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में जो पंक्तियाँ सुनाई गयी, उन पंक्तियों को सुनकर एक सैनिक की पत्नी की विरह-वेदना का आँकलन किया जा सकता है, जिसको यह भी नहीं पता उसकी प्रतीक्षा कब ख़त्म होगी अथवा ख़त्म होगी भी या नहीं:-
“एक बार फिर से आया सावन,
पर तुम कब आओगे..!!
सावन की ये घटायें,
मेरे दिल को हैं तड़पायें,
रिमझिम बारिश की ये बूँदे ,
इन्तज़ार करूँ या पलके मूँदे !!”
कार्यक्रम का संचालन कर रही श्रीमती तौषी शर्मा चौरे द्वारा एक सैनिक के जीवन की महानता एवं मार्मिकता का अपनी पंक्तियों में प्रभावशाली चित्रण निम्न पंक्तियां द्वारा किया गया:-
“शब्द अम्बर भी है छोटा, स्तुति तेरी गाने को।
शांत मौनभी है चीख़ता, गाथा तेरी सुनाने को।”

अंत में, अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति की अध्यक्षा श्रीमती प्रिया भारद्वाज जी ने अपनी इन पंक्तियों के द्वारा सावन और आज़ादी की स्मृतियों को पुनर्जीवित किया:-
“आज धारा की प्यास बुझी है, आज़ादी है पायी,
मंगल मंगल गीत सजे है , द्वार -द्वार दीप जले है
आज़ादी है पायी , आज़ादी है पायी !!”
कार्यक्रम का समापन, प्रिया भारद्वाज जी ने सभी कवियों के आभार प्रदर्शन के साथ किया।
 
 
दो कविताएँ
 
 
 
 
द्वारा - डॉ. सुरेंद्र नेवटिया
 
डॉ. सुरेंद्र नेवटिया, न्यू यॉर्क से हैं| ये पेशे से मेडिकल डॉक्टर है| ३ दशक पूर्व भारत से आये थे| सेवा निवृत होने के बाद पुनः कलम उठाई है और अपनी भावनाओं को अपनी भाषा में कागज पर लिपि बद्ध किया है|
 
 
सच-झूठ
 
झूठ बोलने वालों के पास हथियारों की कमी नहीं होती,
वो कारखाना साथ लिऐ चलतें है।
उनकी कोई शक्ल नहीं होती,
अक़्ल को भी ज़मीन में दफ़नाए चले जाते है।
चिल्लाते रहते हैं वो, हवा को भी कंपकंपा देते है,
तूफ़ान को ठंडी हवा का झोंका बताए जाते है।
सच्च बोलने वालो की दुकान में तो ताला भी नही मिलता, बेचने का कोई सामान नहीं मिलता,
खामोशी की मुस्कान से यह मीठा ज़हर पिए जाते है।
***
 
 
 
मेरी कविता, मेरे विचार
 
डर रहे थे हम हमेशा बाढ़, आग और आँधी से,
तूफ़ान, भूकम्प और सुनामी से।
आज हम डर रहे अपने ही वालों से।
खुद ही के हाथ और चेहरे पर शक होने लगा है,
पास में किसी के बैठने की चाह खो चुका है,
बाहर कही जाने से डर लगने लगा है।
शायद हम खो चुके थे जीवन की इस प्रतिष्ठा को,
भूल चुके थे अपने ही वालों को।
ज़िन्दगी की पहचान अब आने लगी है,
इंसानियत की भावना जागने लगी है,
एक दूसरे की चाहत बढ़ने लगी है।
रात के अंधेरे सब जल जायेंगे
और कल फिर एक सुहाना दिन होगा
आँसुओं के झरने सुख जाएँगे
और सूरज की किरणों से फिर एक वादा होगा।
 
 
 
 
द्वारा - समीर उपाध्याय
 
नाम: समीर उपाध्याय
संप्रति: उच्चतर माध्यमिक शिक्षक
श्री म्युनिसिपल हाईस्कूल थानगढ़
एम. ए.,बी.एड.,एम.फिल. (सुवर्ण चंद्रक विजेता
सौराष्ट्र यूनिवर्सिटी, राजकोट)
एकल काव्य संग्रह: आर्तनाद 2018
विभिन्न राज्यों की हिन्दी पत्रिकाओं में आलेख, लघु कथा, और काव्यों का प्रकाशन
मनहर पार्क :96/a
चोटिला :363520
जिला :सुरेंद्रनगर
गुजरात
भारत
92657 17398
s.l.upadhyay1975@gmail.com
 
 
मुझे कुछ करके जाना है
 
मुझे कुछ करके जाना है

मुझे अपने अस्तित्व को सार्थक करना है।
हस्ती भले ही हो पल दो पल की
किंतु सुमन बनकर अपनी महक फैलाकर एक दिन सूख जाना है।
मुझे कुछ करके जाना है।

मुझे अपने अस्तित्व को सार्थक करना है।
हस्ती भले ही हो पल दो पल की
किंतु विटप बनकर अपनी घनी शीतल छांव देखकर कट जाना है।
मुझे कुछ करके जाना है।

मुझे अपने अस्तित्व को सार्थक करना है।
हस्ती भले ही हो पल दो पल की
किंतु विहग बनकर अपना कर्णप्रिय कलरव सुनाकर उड़ जना है।
मुझे कुछ करके जाना है।

मुझे अपने अस्तित्व को सार्थक करना है।
हस्ती भले ही हो पल दो पल की
किंतु मानव बनकर मानवता की महक फैलाकर पंचमहाभूत में मिल जाना है।
मुझे कुछ करके जाना है।
 
 
हिन्दी भारत की गंगा
 
हिन्दी भारत की गंगा है भाई
डूबकी लगाकर देखो रे लोल।
जन्मोंजन्म के पापों से भाई
मुक्ति पाकर देखो रे लोल।
दुर्लभ जीवन मिला है भाई
आचमन करके देखो रे लोल।
लहर उसकी फैली है भाई
पूरे विश्व में देखो रे लोल।
विश्वभाषा बनी है भाई
मान सम्मान उसे दे दो रे लोल।
 
पहचान उसने बनाई है भाई
अपनी मधुरता से रे लोल।
जहां जहां वो फैली है भाई
आभामंडल रचाती रे लोल।
हिन्दुस्तान के हम हैं भाई
गले लगाकर देखो रे लोल।
हिन्द की धरोहर है भाई
उसे संवारकर देखो रे लोल।
नारा लगाना आज है भाई
हिन्दी की जयकार रे लोल।
जय जयकार जय जयकार
हिन्दी की जय-जयकार।
जय जयकार जय जयकार
हिन्दी की जय-जयकार।
(रे लोल-गुजरात की गरबा शैली का शब्द है)
 
 
अपनी कलम से 
 
 
 
 
 रामायण की रचना कब, कैसे और क्यों हुई
 
विश्व के महाकाव्यों में सबसे बड़े दो महाकाव्य रामायण एवं श्री मद्भागवत संस्कृत में लिखे गए हैं। महर्षि वाल्मीकीय रामायण में ५०० सर्ग एवं २४००0(चौबीस हज़ार) श्लोक है। पूरी रामायण अनुष्टुप छंद में लिखी गयी है। इसमें ६ कांड है - बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुंदरकांड, युद्धकाण्ड। उत्तरकाण्ड बाद में अलग से है।
एक समय वाल्मीकि ऋषि के अनुरोध पर नारद मुनि ने उन्हें श्रीराम की कथा सुनाई। देवर्षि नारद के वचन सुनकर वाक्य में निपुण धर्मात्मा वाल्मीकि ने अपने शिष्यों के साथ उनकी पूजा की। नारदजी के देवलोक चले जाने के कुछ समय बाद महर्षि वाल्मीकि भगवती जाह्नवी (गंगा) के पास बहने वाली तमसा नदी के तट पर गए। तट पर पहुँच कर मुनि ने कीचड़ रहित एक स्थान देखा और पास ही खड़े एक शिष्य कहा - भरद्वाज ! यह स्थान बड़ा रमणीक है। जैसे सज्जन पुरुष का मन हो, उसी तरह यहाँ का जल भी बहुत स्वच्छ है। वत्स !कलश यहीं रखो और मेरा बल्कल वस्त्र दे दो। आज मैं तमसा के इसी उत्तम तीर्थ में स्नान करूँगा। गुरु के आज्ञाकारी शिष्य भरद्वाज ने महात्मा बाल्मीकि के ऐसा कहने पर बल्कल वस्त्र दे दिया। शिष्य के हाथ से बल्कल लेकर संयतेन्द्रिय महामुनि सब मोर सघन वन को देखते हुए टहलने लगे। उस वन में ही उन्होंने एक क्रोंच पक्षी के जोड़े को प्रसन्न मन से मधुर बोली बोलते और विहार करते देखा। उसी समय एक पापी विचार वाले और अकारण वैरी निषाद ने उनमें से एक याने पुरुष क्रोंच को मार डाला। उसे रूधिर से भरा धरती पर छटपटाते देख उसकी भार्या क्रौंची करूण स्वर में विलाप करने लगी। क्योंकि अभी-अभी वह अपने लाल मस्तक वाले चिरसंगी और प्यारे पति से बिछुड़ी थी। इस प्रकार उस निषाद के हाथों मरे हुए क्रोंच को देखकर महात्मा वाल्मीकि के मन में करूणा जागी। करूणा उत्पन्न होने के कारण और रोती हुई क्रौंची को देखकर उन्होंने निषाद के इस वर्ष को बहुत अधर्म समझा और वचन उनके मुख से निकला –
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः ।
यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधी काममोहितम् ।।
अरे निषाद तूने काम मोहित क्रोंच के जोड़े में से एक क्रोंच का वध किया है। अतः तू बहुत वर्षों तक नहीं जियेगा। ऐसा कहने के पश्चात् वे अपनी बात (श्राप) पर विचार करने लगे की इस पक्षी के लिए शोकार्त होकर मैंने यह (श्राप) क्या कर डाला। इस प्रकार विचार करते हुए उन्होंने मन ही मन में कुछ सोचकर शिष्य भरद्वाज से कहा - अनुष्टुप छंद में बंधा और गुरु-लाघवादि अक्षरों से वैषम्य से रहित और वाध पर गाये जाने योग्य यह श्लोक जो अभी मेरी शोक अवस्था में उचरित हुआ है, वह व्यर्थ नहीं हो सकता। इस तरह निज गुरु के मुख से उचरित उस सर्वोत्तम श्लोक को शिष्य भारद्वाज ने प्रसन्न मन से कंठस्थ कर लिया और ऋषि वाल्मीकि भी बहुत प्रसन्न हुए। कुछ समय तक दोनों ( अन्य शिष्य भी ) उस श्लोक पर विचार करते रहे। समयोपरांत ब्रह्माजी उनसे मिलने आये। कम बोलने वाले ।
 
 
द्वारा - श्याम सुंदर शर्मा
 
श्याम सुंदर शर्मा अ.हि.स. के वूस्टर, MA शाखा के संस्थापक अध्यक्ष हैं।
इनके अध्यक्ष काल में अ.हि.स. का १२ वाँ अधिवेशन भी वहाँ हुआ था। उस समय अ.हि.स. के राष्ट्रीय अध्यक्ष आदरणीय सुरेन्द्र नाथ तिवारी, न्यू जर्सी थे।
     
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
वाल्मीकि ने उनका स्वागत किया। आने का कारण पुछा। ब्रह्मा जी ने मुनि से कहा तुम्हारा वह वाक्य श्लोक ही था। इसका शोक न करो - मेरी इच्छा से ही तुम्हरे मुँह से यह वाणी प्रकटी है। हे ऋषि ! अब इसी छंद (अनुष्टुप) में तुम धर्मात्मा और बुद्धिमान श्री राम के चरित्र का गान करो। तुम राम के चरित्र गन को उसी तरह से लिखो (गाओ) जैसा तुमने नारदजी के मुख से सुना था। तुम्हें सब याद हो जायेगा। इस काव्य में तुम्हारी वाणी कभी व्यर्थ नहीं होगी। संसार में अंत समय तक तुम्हरी रची राम कथा अमर हो जाएगी। बार-बार उस श्लोक को ध्यान में रखकर हजारों श्लोकों(२४०००) में रामायण की रचना कर दी।
महर्षि वाल्मीकि के बारें में एक और प्रचलित कथा है। उसमें वाल्मीकि को वन में रहने वाला एक लूटेरा और हत्यारा बताया। वन से आने -जाने वाले यात्रियों को लूटता मारता था। निषाद द्वारा मारा गया क्रोंच पक्षी पेड़ के निचे बैठे वाल्मीकि की गोद में गिरा। उनमें करुणा जागी और वह प्रसिद्ध श्लोक उनके मुख से निकला।
इस कथा ने एक प्रकार से वाल्मीकि का अपमान ही किया। यह सत्य है रामायण की रचना करने वाले ऋषि वाल्मीकि ही थे। संस्कृत भाषा में होने की वजह से आम जनता अन्धकार में रह गयी। तुलसीदास रचित रामचरितमानस एक प्रकार से रामायण के नाम से बिकने लगा। उत्तर भारत में प्रत्येक हिन्दू के घर में रामायण के रूप में तुलसीदास जी का रचा हुआ रामचरितमानस अवश्य मिल जाएगा। लेकिन रामायण नहीं मिलेगी। वाल्मीकि रामायण एक असाधारण ग्रन्थ है। जिसमें भूगोल, इतिहास छिपा है। वृक्षों, फूलों, नदियों के नाम, बड़े-बड़े सरोवर, वन, मधुरफल, औषधि तथा उपचार की वस्तुओं इत्यादि का वर्णन मिलेगा।
रामायण की महिमा- म्यांमार में रामयण-यामायन के नाम से विख्यात है, कम्बोडिया में रामकृति, मलेशिया में हिकायत सेरी रमा, इंडोनेशिया में काकावीन रामायाना , जापान में हेबतुसुरा, फिलीपींस में महारादिया लावाना, लाओस में फ्रा रामा और थाईलैंड में रामकियन नाम से विख्यात है। थाईलैंड में तो रामायण नेशनल पुस्तक भी है।
 
 
 
 
 
 
 
 
सोचा न था . भाग २ ..
(भाग १- सितम्बर अंक में )
 
(पिछले अंक के बाद से ...)
सूरज के दबिश देने से पहले ही आज पहली बार रामकृपाल भी बिस्तर छोड़ चुके थे।
उन्होंने दलान में एक कोने में पड़ा फावड़ा उठाया तो मालती देवी चिल्लाते हुए बोली – मालती - “अब ई कहाँ लेके चले इस बुढ़ापे में ।”
रामकृपाल - “आता हूँ !” कहकर चलने को हुए।
मालती - “अरे ! पहले कुछ खा तो लो ! चाह-साह पी लो, फिर चलो पहलवान बनने।
मेरी सुने तो न कभी, जवानी में न सुनें कभी! तो अब ई बुढ़ापे में का सुनोगें ।” कहकर गर्दन झटकते हुए चाय चढ़ा दी चूल्हें पे। उन्होंने रोटी और सब्जी खाई, चाय पी और फावड़ा उठाकर बाहर की ओर चल दिए। दोपहर तक चार-पाँच गड्ढा कर लिया था उन्होंने। न जाने कैसे बूढ़ी हड्डी में जान आ गयी थी। गड्ढा करते जाते रहे जा रहे थे और दिमाग में पोते की आवाज गूंजती जा रही थी। शायद उन्हें ताकत वहीं से मिल रही थी। दोपहर घर आकर खाना खाने के बाद गुमसुम लेटे रहे। फिर थोड़ी देर में बाहर निकल गए। शाम घर लौटने तक उन गड्ढों में उन्होंने आम और नीम का पौधा लगा दिया था। अब तो रोज का यही नियम हो गया था। दिन भर मेहनत करके दो-तीन पौधे रोप देते थे। पहले घर के चारों तरफ, फिर अपने खेत की मेड़ों पर। अब तो वो अपने खेत को पूरी तरह से बाग बनाने की बात करने लगे थे।.
 
 
द्वारा - सविता मिश्रा
 
 सविता मिश्रा 'अक्षजा' आगरा, उत्तरप्रदेश, भारत से हैं। इनका 'रोशनी के अंकुर' लघुकथा एकल-संग्रह प्रकाशित है। जिसे कई सम्मान प्राप्त हैं। यह कहानी ‘सोचा न था’ एक लम्बी कहानी है पर तीन पीढ़ियों को जोड़ती है और प्रकृति के एक मूल विषय को सोचने को विवश करती है।
 
 
अड़ोसी-पड़ोसी ताना मारते –
गांव वाले - “लगता है शहर से काका कोई नशा करके आए हैं।
खेती न करके, अब पेड़ लगाकर हरियाली वापस लायेगें। लेकिन रामकृपाल का जुनून सर चढ़कर बोलने लगा था। अब तो वह गाँव में सूख चुके तालाबों को फिर से पानी से लबालब भरने के लिए गाँव प्रधान पर जोर डाल रहे थे।
चार-पांच दिन ही बीते थे कि बेटे को गाँव आया देखकर मालती देवी प्रफुल्लित हो गयीं –
मालती - "अच्छा हुआ बेटा जो तू आ गया। तेरे बाबा तेरे पास से जब से लौटे हैं, बड़े गुमसुम-से रहते हैं।
क्या हुआ ऐसा वहाँ?"
शेषधर - “कुछ नहीं अम्मा !”
मालती - "कुछ तो हुआ है ! रोज जितनी हिम्मत होती है, गाँव की बंजर जमीनों में आम-नीम का पेड़ लगाते रहते हैं। गाँव वालों से भी उस सूख गए गड्ढे को खोदकर फिर से तालाब बनाने की गुजारिस करते फिर रहे हैं ।"
शेषधर - “तेरा पोता ..! कह थोड़ी देर चुप्पी साध ली।
मालतीदेवी फिर से उसके मुख खुलने का इंतजार करती हुई उसे टुकुर-टुकुर ताकती रहीं।
शेषधर - “तेरा पोता पीयूष, बड़ा हो गया है अम्मा !” पानी की गिलास रखता हुआ बोला –
“और तू जानती है, वह बचपन से ही स्पष्ट वक्ता रहा है।
बाबा जिस दिन गुस्सा होकर घर से चले आए मैं उसी दिन यहाँ आ जाता लेकिन ऑफिस से छुट्टी नहीं मिली थी अम्मा। शनिवार रविवार छुट्टी पड़ी तो भागा आया आज ।”
मालती - “तो क्या ! कोई चुभती हुई बात कह दी उसने इन्हें ! वरना जो आदमी एक तुलसी का पौधा न रोपा कभी, वह दिन में दो-चार पेड़ लगा दे रहा ! तूने उससे कुछ बोला नहीं?"
शेषधर - "उसने कुछ गलत न बोला अम्मा, तो उससे क्या कहता मैं। बल्कि मैं खुद बदलते वातावरण से परेशान हूँ, रिटायर होते ही इस ओर ध्यान दूँगा। बल्कि मैं अब हर हफ्ते आकर पेड़-पौधे लगाने की कोशिश करूँगा ।”
मालती - "बात तो बता बेटा, पहेलियाँ काहे बुझा रहा है? उसने ऐसा क्या कहा तेरे बाबा को?”
शेषधर - "उसने बाबा को फालतू पानी बहाते देख कह दिया कि 'पानी की बर्बादी नहीं करिए।
जानते हैं ! एक दिन में बस पाँच-सौ लिटर पानी मिलता है।
दादाजी ! आप इस तरह पानी बहायेंगे तो कैसे काम चलेगा !’ और ...!”
मालती - "और ...कुछ और भी बोला ! इतना बड़ा हो गया क्या ?"
विस्मित-सी होकर अम्मा बोली।
शेषधर - "और कह दिया कि ‘आपके दादा-परदादा पेड़-पौधे लगाकर वातावरण को हरा-भरा रखे आप की पीढ़ी ने बैठे-बैठे उसके खूब मजे लूटे। अब आपकी पीढ़ी की निष्क्रियता के दंड हम भुगतेंगे ही।"
उसकी इन्हीं बातों से बाबा क्रोधित होकर वहाँ से अकेले बिना नाश्ता-पानी के ही चले आए।"
मालती - "हाय राम ! उसने इतना कुछ कह कैसे दिया !"
शेषधर - "अम्मा ! दादा-परदादा के लगाये पेड़-पौधे आंधी में उजड़ते गए, हम उन्हें बेचते गए !
तालाब-कुआँ भी पाटकर बस्ती बसा डाली !
अब तक मन माफ़िक पानी की बर्बादी भी होती रही।
एक दो कुआँ जो बचे रह गए उन कूओं का भी जलस्तर जाता रहा है।
अब इन सब का खामियाजा नई पीढ़ी को तो भुगतना ही पड़ेगा।
और वो इसी तरह झल्लाते हुए अपने पूर्वजों को गाहे-बगाहे कोसते रहेंगे.!” चिंतित होता हुआ बोल।
अम्मा चाय का गिलास उसके हाथों में थमा चुकी थी।
शेषधर - "कल से पिताजी के साथ मैं भी पेड़ लगवा आऊँगा। बस उनकी देखरेख तुम करती रहना अम्मा।
मैं शहर से कुछ पौधे लाया भी हूँ।”
पपीता, इमली, बोगनबेलिया, पलाश के पौधों को झोले में से दिखाते हुए बोला।
मालती - "कई बार कहें कि पुराने पेड़ धीरे-धीरे गिरते जा रहें, लगा दीजिए कुछ फलों के पेड़।
मेरे कहने से तो सुने नहीं कभी ! अच्छा हुआ जो पोते ने चोट दी!
अब उसकी दी हुई चोट की ओट में जमीन की खोट दूर हो जाएगी। कितने बीघे जमीन बंजर होने को थी।
इस बुढ़ापे में खेती-बाड़ी तो हो ही नहीं रही थी। कम से कम पेड़ लग जाएंगे तो खेत हरे-भरे दिखेंगे।”
थोड़ी देर में ही पिताजी भी आ गए तो बेटे ने तुरंत उठकर उनका चरण स्पर्श करके कहा-
शेषधर - “पिताजी ! अपने पोते की छोटी-सी बात पर ऐसे नाराज होकर क्यों चले आए ?
वह भी आपके चले आने के बाद में रो रहा था। कह रहा था कि मैंने क्यों कहा दादा जी को ऐसा!”
रामकृपाल ने हाथ-पैर धोया और आकर चारपाई पर बैठ गए। लेकिन अब तक बेटे से कुछ भी ना बोले थे।
बेटा उनके गुस्से को भाप चुका था। उसने अपनी जेब में हाथ डाला और एक कागज का छोटा-सा टुकड़ा निकालकर बाबा को पकड़ाते हुए बोला-
शेषधर - “आप के पोते ने, आपके लिए यह चिट्ठी लिखकर दी है।”
रामकृपाल ने अनमने मन से खत को पकड़ा फिर अपनी बगल में, चारपाई पर रख दिया।
मालती देवी ने हुलसकर कहा- मालती - “पढ़ो तो सही ! का लिखा है मेरे पोते ने।”
रामकृपाल के हाथों में फिर वही कागज़ था लेकिन इस बार वह भी उस पत्र को पढ़ना चाहते थे।
पत्र खोला। टूटी फूटी आवाज में शब्दों को जोड़-जोड़कर अटक-अटकर धीरे आवाज में बोल-बोलकर रामकृपाल पत्र पढ़ने लगे।
रामकृपाल - “ दादा जी ! माफ़ कर दीजिए। मुझसे गलती हो गई।
दादा जी मैंने भले ही बात सही कही थी लेकिन मेरा कहने का अंदाज़ बहुत ही ज्यादा गलत था। आप तो पापा के पापा हैं ना ! इसलिए मेरी इस गलती को माफ कर देंगे। पोता तो दादा जी का लाडला होता है ना।”
कार्टून के जरिए उसने पत्र में कान पकड़ते हुए अपना चित्र भी बनाया था। पढ़कर रामकृपाल ने अपने बेटे की ओर देखा, फिर मालती देवी की ओर देखकर मुस्कुरा पड़े। उनकी आँखें पनीली हो गयीं थीं।
रामकृपाल - अच्छा अब इसके लिए कुछ इसकी पसंद का बनाएगी भी या यहीं बैठी बतियाती रहेगी !”
कहकर अपने बेटे की पीठ पर धौल देते हुए बोले –
रामकृपाल - “उससे कहना कि उसने कुछ गलत न कहा। भले ही मुझे उस समय अपमानजनक लगा
लेकिन बाद में मैंने इस बारे में बहुत सोचा फिर समझा कि वह नहीं सच में गलती तो हम करते आये अब तक ।” दोनों बाप-बेटे मिलकर दो दिन में दस-बारह पेड़ लगा दिए थे। पुराने लगे पेड़ों के पौध में गुड़ाई करके गोबर की खाद डाल दी थी। पौधों को देखता हुआ बेटा बोला-
शेषधर - “पिताजी ! देखना मेरे रिटायर होते-होते यह गाँव प्रकृति संपदा में सबसे धनी गाँव हो जायेगा।”
एक दिन शेषधर अपने पिता रामकृपाल के साथ कंधे पर फावडा और पीठ पर कुछ पौधे लादे हुए गाँव से निकलते हुए खेतों की ओर जा रहा था कि गाँव के कुछ लोगों ने पिता का पुत्र की खिल्‍ली उडाते हुए कहा
गांव वाले – “अब बेटे को भी नशा चढा है जंगल को गाँव में उतारने का”
दूसरा बोला – “क्‍या करे शहरी बाबू जो हो गया, खेतीबाड़ी तो कभी की नहीं, पेडों से ही बंजर जमीन को भरेंगे”
एक अधेड़ व्यक्ति ने चुटकी ली – “बाप तो पगलाया ही था, अब बेटवा भी साथ मिल गवा ।”
पिता रामकृपाल चुपचाप चलता जा रहा था किन्‍तु शेषधर की मुट्ठियाँ भींच गयी थीं। रामकृपाल ने उसे आँखों के इशारे से सांत्वना देकर चुप रहने को कहा। शेषधर पिता के पास आकर फुसफुसाया – बाबा ! अकेले हमारे खेत में पेड़ खड़ा होने से कुछ न होगा। गाँव को गुलज़ार करना है तो सबको इस अभियान में शामिल करना होगा। मैं गुस्से में किसी से बात नहीं करूँगा, भले वह मुझपर छींटाकसी करें। लेकिन इन सबको समझाना तो होगा न बाबा !”
कोई कुछ और बोलता इससे पहले शेषधर पीछे मुडकर खड़ा हो गया, फावड़ा और पौधे जमीन पर रखकर बहुत ही शान्‍त और मीठे स्‍वर में बोला शेषधर- तुम्‍हें, धरती और मनुष्‍य के सम्‍बन्‍ध का ज्ञान नहीं, ये दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं। संसार के हर प्राणी का अस्तित्‍व अपनी माँ से है। और जानते हो अपनी माँ और धरती माँ में कोई भेद नहीं है। माँ अपने बच्चों को पालती है तो यह धरती माँ हम सब का पालन-पोषण करती है। अपने सीने पर पेड़-पौधें-सरोवर धारण करके हमें चिलचिलाती धूप में छाँव, ईधन, भोजन और हवा देते रहने का इंतजाम करती है ताकि हम सुकून का जीवन जी सकें। धरती माँ हमें तपते मरूस्‍थल में भी पानी दे सकती है लेकिन उसके लिए बदले में हम सब को उसको हरा-भरा रखना होगा।”
बुजुर्ग बाबा की ओर देखकर फिर बोला – “क्यों काका ! मैं सही कह रहा हूँ न !” काका ने हाँ में अपनी मुंडी हिला दी । “कदम लड़खड़ायें या ठोकर लगे, हर प्राणी को अपने आँचल में यह धरती छिपा लेती है। अपनी नर्म-नर्म घास से हमें चोट लगने से बचा लेती है। मनुष्‍य चाहे जैसा भी कर्म करें परन्‍तु धरती माँ सभी के लिए अपना आँचल बिछाये रहती है। ये पेड़-पौधे धरती माँ के वस्‍त्र हैं, उनका सृंगार हैं। माँ को वस्‍त्रों से ढके रखना हमारा फर्ज है। हमें किसी भी हालत में अपना फर्ज नही भूलना चाहिए। क्‍योंकि हमारी हर साँस इस धरती माता की ऋणी है। पिताजी के साथ मैं भी जाग गया हूँ, अब आप सब भी उन्नीदी से जागो ।”
शेषधर की बात गाँव वालों को समझ आ गयी और सभी लोग शेषधर और रामकृपाल के साथ कंधे से कंधा मिलाकर गाँव को हरियाली से गुलजार करने को तैयार हो गये। कुछ तो तुरन्‍त ही अपना-अपना फावड़ा लेकर साथ चल दिए, शेष महिला, पुरूष, किशोर, जवान और बूढ़े अगले दिन शेषधर और रामकृपाल के नक्‍शे कदम पर चलने को बेताब दिखे।
पाँच साल के बाद शेषधर की बात सच होने लगी थी। पेड़-पौधों से वीराना गाँव, जिसमें कभी दो-चार पेड़ हजार-दो हजार गज में दिखते थे। आज पेड़ ही पेड़ थे जिधर भी नजर जाती थी। चारों तरफ हरियाली-ही हरियाली फैली थी। आम, इमली, गुलमोहर, जामुन, अमरूद, महुआ, पलाश, कैथा, बेल तथा कदम्ब के पेड़ चहुँ दिशा में फैले थे। कहाँ गाँव में एक भी तालाब नहीं था वहाँ अब दो-तीन छोड़े-बड़े तालाब पानी से लबालब भरे हुए थे।
गाँव के जानवर तालाब के पानी में अठखेलियाँ करते रहते थे। पक्षी भी बसेरा करने आ पहुँचे थे। गौरैया जिनका नाम-ओ-निशान मिटने को था उनके लिए हर पेड़ पर कृत्रिम घोंसला बनवाकर पेड़ों-घरों की दलानों
में टाँग दिया गया था। गोरैया की चींचीं भी अब गाँव में गूँजने लगी थी।
रामकृपाल और उनके बेटे के साथ पूरा गाँव कंधे से कंधा मिलाकर उजाड़ हुए गाँव को स्वर्ग-सा गाँव बना दिया था। गाँव के कुँए फिर से गुलजार हो चुके थे। उन कुओं की जगत के किनारे-किनारे पुदीना, मनी-प्लांट और थोड़ी-सी दूरी पर केले के पौधे लहलहा रहे थे। तालाब के बाँध पर चारों तरफ भी पेड़ लगवा दिए गए थे। रामकृपाल के छोटे से अभियान ने गाँव में क्रांति ला दी थी। गाँव के तालाब में मछली पालन होने लगा था। कुँए गाँव की औरतों से गुलजार होने लगा था। पानी भरने वाली औरतें कसेड़ी, गागर, बाल्टी लिए कुँए की जगत पर बतियाती दिखने लगी थीं।
रामकृपाल के अभियान में बेटे शेषधर के सहयोग ने हवन में घी का काम किया था। पूरा गाँव हरा-भरा और गंदगी से मुक्त हो चुका था। पक्षियों के चहचाहट से गुलजार, मोर के पीहू-पीहू से मनोरम हो उठा था। राकेश की राजनीतिक पहुँच ने गाँव के विकाश में चार चाँद लगा दिया था। गाँव में बिजली-सड़क सब चकाचक हो चुके थे।
पूरा गाँव सज-धज के साथ अपने मुख्यमंत्री के स्वागत के लिए आज तैयार था। रामकृपाल कलफ़ लगे कुर्ते और मौर निकाले साफ़े के साथ तैयार हो चुके थे। शेषधर भी कोट-पैंट में अपने परिवार के साथ रामकृपाल के पीछे खड़ा था।
एक साल पहले ही बेटे शेषधर का नाम अवार्ड के लिए प्रस्तावित था। गाँव का दौरा करने आई टीम ने उनके नाम पर अपनी सहमती की मुहर लगा दी थी। उनके परिवार के साथ पूरा गाँव ख़ुशी से झूम रहा था।
मुख्यमंत्री का गाँव में आगमन हुआ। आदर के साथ गर्मजोशी से उनका स्वागत सत्कार किया गया। गाँव का चारों तरफ से भ्रमण करते हुए वह पूरी तरह से खुश नजर आ रहे थे। स्वागत सत्कार के बाद मंच पर आदर-सहित सभी मेहमानों को बैठाया गया। मंच से मुख्यमंत्री ने जैसे ही हरित क्रांति अवार्ड की घोषणा की, गाँव के लोग तालियों की गड़गड़ाहट के बीच झूम उठे। पवन के झोंकों ने भी अभी-अभी जवान हुए पेड़ की डालियों को झूमने में सहयोग किया। हवा के साथ झूमते हुए पेड़-पौधों ने शेषधर का अभिनंदन किया। चिड़ियों की चहचाहट से वातावरण और भी खुशनुमा हो उठा था। शेषधर अवार्ड लेने मंच पर पहुँचे तो उनके पिता रामकृपाल खुशी से गदगद हो उठे। आँखें अश्रु से भर उठी। अम्मा की आँखों के सामने भी आँसुओं का पर्दा पड़ गया। माँ-बाप दोनों को गर्वान्वित होता देख बहु भी तालियां पीटने लगी। सिर का पल्ला ख़ुशी के अतिरेक में तालियाँ पीटते हुए सरकने लगा। जिसे उसने शर्माते हुए संभाल लिया।
जैसे ही शेषधर का अभिनंदन करके अवार्ड से नवाजा जाने लगा उसने माइक संभालते हुए कहा-
शेषधर - “माननीय मुख्यमंत्री जी इस अवार्ड के असली हकदार तो मेरे पिता श्री रामकृपाल जी हैं।
जिन्होंने अपनी पचहत्तर साल की उम्र को धत्ता बताकर खुद फावड़े से गड्ढे कर-करके पौधे रोपे हैं।
मैं उनकी इस लगन को देखकर प्रेरित हुआ।
मैं चाहता तो मजदूर बुलाकर कर एक दिन में बीसियों गड्ढे करवाकर पेड़ लगवा सकता था।
लेकिन मैं भी अपने पिता की तरह खुद से मेहनत करते हुए पौधों के साथ पल-पल जीना चाहता था।
अपनी मेहनत का रंग उनमें भरना चाहता था।
मैं चाहता हूँ कि मुख्यमंत्री महोदय मेरी बजाय मेरे पिता को यह सम्मान दें।
इस सम्मान पर असली हक उनका ही है। मैं तो बस उनके नक्शेकदम पर चलने वाला निमित्त मात्र हूँ।
पिता रामकृपाल के एक-एक सीढ़ी चढ़ने पर तालियों की गड़गड़ाहट तेज होती जा रही थी।
जैसे ही मुख्यमंत्री जी उन्हें अवार्ड देने लगे तो उन्होंने इशारे से उन्हें रोकते हुए कहा कि
रामकृपाल – “इसका असली हकदार मैं नहीं, कोई और है। जिसने मुझे इस हरियाली की डगर दिखायी।
यदि वह उसदिन मेरे नहाने में ढेर-सा पानी बहाते हुए देखकर भी न बोलता तो शायद यह क्रांति करने की बिल्कुल भी नहीं सोचता। और मेरा जीवन बिना पौधारोपण के पुण्यकर्म के ही समाप्त हो जाता।
लेकिन उसने मुझे डांटकर मेरी बंद दृष्टि खोल दी। जिससे कि मैं अपने गांव की वीरानी को भांप पाया
और उसे हरियाली में बदलते हुए देख सका, अपने जीते-जी। मैं चाहता हूँ यह अवार्ड उसके असली हकदार को दिया जाए। तो इसका असली हकदार, मेरा पोता पीयूष है !”
मुस्कराकर उन्होंने अपने पोते को स्टेज पर इशारे से बुला लिया।
मुख्यमंत्री ने तीनों को एक साथ उस अवार्ड से सम्मानित किया।
और गर्व से कहा-
मुख्‍यमंत्री - “जिस गाँव की प्रकृति डोर किशोर, जवान और बूढ़े तीनों के हाथों में हो! भला उसकी प्रगति को कोई भी कैसे रोक सकता है। उसकी सम्पदा को! कोई कैसे लूट सकता है। मैं चाहता हूँ कि आपके गाँव से प्रभावित और प्रेरित होकर और भी गाँव के लोग अपने-अपने गाँवों में हरित-क्रांति लाए। और अपना गाँव बचाए, अपना हिंदुस्तान बचाए। जय जवान! जय किसान ! का नारा को बुलंद करें। जय हिंद ! जय भारत!
और एक बार फिर से रामकृपाल और उनके पूरे गाँव को ढेरों बधाई।”
अवार्ड लेकर स्टेज से नीचे उतरते ही पत्रकार और आसपास के गाँव के लोगों ने घेर लिया।
सवालों की झड़ी लग पड़ी थी।
जिसका जवाब शेषधर मुस्कुराकर देते जा रहे थे
और अवार्ड के साथ तीनों की फोटो उतारने में पत्रकारों के फ्लैश चमकते जा रहे थे।
 
 
 
 
प्रबंध सम्पादक
 
- सुशीला मोहनका
 
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति परिवार के सभी मानद सदस्यों का अभिवादन है।
आशा करती हूँ आप इस Covid-19 की सुनामी की इस तीसरी लहर में अपना एवं अपने परिवार का पूरा ध्यान रख रहे होंगे। इस महामारी में यह बहुत आवश्यक है कि आप सरकार के बनाये स्वास्थ्य नियम का पूरी तरह से पालन करे एवं स्वस्थ्य रहें।
मुझे यह बताते अति प्रसन्नता हो रही है कि अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति का २०वाँ आभासी अधिवेशन शनिवार ९ और रविवार १० अक्टूबर २०२१ को मेडाइना , ओहायो में बहुत ही अच्छी तरह, अच्छी उपस्थिति के साथ सम्पन्न हुआ। इस अधिवेशन का मूल विषय ‘’दूसरी भाषा के रूप में हिंदी सीखने और सिखाने की विधि” (Teaching and Learning Techniques for Hindi as a 2nd Language) था। इस अधिवेशन में सभी ने अपनी-अपनी भागीदारी निभायी, सबको बहुत-बहुत धन्यवाद है। तन-मन-धन से सभी ने अपना सहयोग दिया, पुनः धन्यवाद।
इस अधिवेशन में पहला कार्यक्रम स्वागत समारोह था इसकी जिम्मेदारी डॉ. तेज पारेख ने बहुत ही अच्छी तरह निभाई। दीप प्रज्वलन और सरस्वती वन्दना के बाद मेडाइना सिटी के मेयर डैनिस हैनवेल ने औपचारिक रूप से 4 अक्टूबर के सप्ताह को "हिंदी जागरूकता सप्ताह" के रूप में घोषित किया ।
इसके बाद अधिवेशन के अवसर पर प्रकाशित स्मारिका का विमोचन डॉ. पुरूषोत्तम गुजराती, ने किया और पहली पुस्तक डॉ. शैल जैन को दी। तत्पश्चात श्रीमती सुशीला मोहनका , न्यासी समिति अध्यक्ष ने अक्टूबर २०२१ की विश्वा का लोकार्पण किया और पहली प्रति राष्ट्रीय अध्यक्ष अजय चड्डा जी को दी।
इस अधिवेशन में कुल ९ कार्यशालाएँ हुई ,पहले दिन और दूसरे दिन ---
पहले दिन शाम को ३ घंटे का सांस्कृतिक कार्यक्रम हुआ। इसमें अ.हि.स की कई स्थानीय शाखाओं ने कार्यक्रम प्रस्तुत कर अपनी-अपनी भागीदारी निभाई। उत्तर-पूर्व ओहायो शाखा ने हिंदी के लम्बे इतिहास को बड़ी ही अच्छी तरह दिखाया। एक घंटे में हजारों वर्षों के लम्बे इतिहास को दर्शाना मनो गागर में सागर भरने के समान ही था।
दूसरे दिन सुबह का पहला कार्यक्रम स्वागत समारोह था जिसे डॉ. गिरीश शुक्ला जी ने बड़ी अच्छी तरह निभाया, इसमें सोलन सिटी के मेयर एडवर्ड क्रॉस ने अपना प्रोक्लोमेशन पढ़कर स्वयं सुनाया।
उसके बाद कार्यशालाओं का सिलसिला प्रारम्भ हुआ।
प्रत्येक बार की तरह इस बार भी अधिवेशन में विराट कवि सम्मेलन बहुत ही अच्छी तरह सम्पन्न हुआ।
कार्यक्रम आभासी होने का एक विशेष लाभ अधिवेशन को मिला कि विभिन्न राष्ट्रों से कवि एवं श्रोता अत्यधिक संख्या में जुड़ सके । विश्वस्त सूत्र से मालूम हुआ कि पाँच महादेशों से हजारों से ऊपर की संख्या में जनता-जनार्दन का जुड़ाव हुआ ।
 
 
Support us while you shop at Amazon - 100% Free
Click here to learn more
 
Advertize with us - Extend your global reach
Click here to learn more
 
Facebook
YouTube
 
 
This email was sent to {{ contact.EMAIL }}
You received this email because you are registered with International Hindi Association
mail@hindi.org | www.hindi.org
 
 
 
SendinBlue
 
 
© 2020 International Hindi Association